Thursday, May 28, 2015

वक्त के धारे


वक्त के साथ ही , नज़ारे बदल जाते हैं । 
आँखों ही आँखों के , इशारे बदल जाते है । 
देता नहीं कोई साथ , इस जहाँ से उस जहाँ तक । 
जहाँ के बदलते ही , सहारे बदल जाते हैं । 

सुख के मीत बहुँत मिलेंगे , दुःख का साथी कोई नहीं । 
सुख दुःख के बदलते ही , मीत सारे बदल जाते हैं । 
वक्त ये रंग लाता नहीं , तो बदलाव जीवन में आता नहीं । 
मौसम के बदलते ही , गीत सारे बदल जाते हैं । 

 हर लम्हा जीवन में , व्यक्ति वही होता है ।  
उम्र के साथ ही , रूप-रंग सारे बदल जाते हैं । 
गर्मी और बरसात में , कितना अंतर होता है । 
आसमाँ  के भी चाँद सितारे बदल जाते हैं । 

सीता और राम के किस्से , सुनाती है ये  दुनिया । 
रामायण के बंद होते ही , किस्से सारे बदल जाते हैं । 
गीता के उपदेस हमें , ता उम्र सुनाये जाते हैं । 
युद्ध क्षेत्र  में आते ही , प्रयोग सारे बदल जाते हैं । 

अर्जुन वही  श्री कृष्ण वही  , वही धनुष और तीर । 
वक्त के बदलते ही , धनुष के कारनामें बदल जाते हैं । 
वक्त न जानें  हमें , कहाँ-कहाँ भटकाता है । 
वक्त के बदलते ही , सफ़रनामें बदल जाते है । 

वक्त ने ही ध्रुव और प्रह्लाद को भी कष्ट दिए । 
वक्त के साथ ही , सिंहासन सारे बदल जाते हैं ।
वक्त ने ही हरिश्चन्द्र को , काँटों भरी सेज दी । 
वक्त के बदलते ही , सेज सारे बदल जाते हैं । 

 सब कुछ इस जहाँन में , विचारों का ही खेल है। 
विचारों के बदलते ही , लक्षण सारे बदल जाते हैं। 
धीरज रखिये, धीरज रखिये, कह गए हैं संत सभी। 
धीरज मात्र रखने से ही , क्षण सारे बदल जाते हैं। 

वक्त ने ही दिया हमें , श्रीराम और श्रीकृष्ण। 
वक्त के साथ ही , युग सारे बदल जाते हैं। 
जो वक्त के साथ नहीं चलता , वह करता है भूल बड़ी। 
वक्त के साथ चलते ही , वक्त के धारे बदल जाते हैं।   

Friday, May 22, 2015

मेरा घर


मेरा घर ये सपनों का ,
अपना और अपनों का ,
अनगिनत  अरमानों का ,
 घर आए मेहमानों का । 

मैं इस घर की रानी हूँ ,
अनमिट अटल कहानी हूँ ,
मेरा  घर ये सपनों का ,
अपना और अपनों का । 

सुख- दुःख  का साथी है ,
दिया है और बाती  है,
जगमग ज्योति जलती है ,
खुशियाँ जहाँ पे पलती  हैं । 

संग-संग हम रहते हैं ,
सुख और दुख सब सहते हैं ,
देख-देख हर्षाती हूँ ,
यहाँ बहुत सुख पाती  हूँ ।

हे प्रभु इतनी दया करना ,
हम पर सदा कृपा करना ,
कभी न घर में लड़ाई हो ,
चाहत और भलाई हो । 

आशा और विश्वास हो ,
सदा आपका साथ हो ,
प्रेम ही दें और प्रेम ही पाएं ,
धूप-दीप से घर महकाऍ । 
मेरा घर ये सपनों का ,
अपना और अपनों का । 

Sunday, May 17, 2015

बहुत बड़ी ख़ुशी

मेरी बेटी , एक छोटी सी मैना ,
इस डाल से उस डाल पर ,
फुदकती हुई ,  कैसे बड़ी हुई पता ही नहीं चला। 
दुनिया के झंझावातों से गुजरती हुई ,
दुनिया को जानती हुई  ,पहचानती हुई ,
कैसे बड़ी हुई, पता ही नहीं चला।  
छोटी सी , नन्ही सी, मेरी गोदी में ,
इठलाती हुई , बलखाती हुई ,
कैसे बड़ी हुई, पता ही नहीं चला।  
मुझे प्यार से छूती हुई , सहलाती हुई ,
मेरे जख्मों पर मरहम लगाती हुई ,
कैसे बड़ी हुई, पता ही नहीं चला।  
फूल सी कोमल, सबका दुःख-सुख बांटती हुई ,
सबको हंसती हंसाती हुई, कैसे बड़ी हुई, 
पता ही नहीं चला। 
जब भी मैं खड़ी हुई , जीवन के दो मुहाने पर ,
मुझको ढांढस बंधाती , कुछ समझती और कुछ समझाती हुई,
कैसे बड़ी हुई, मुझे पता ही नहीं चला। 
मेरी बेटी है मेरी प्यारी सी हंसी ,
मेरी प्यारी सी दुनिया 
एक नन्ही सी छुअन और एक बहुत बड़ी ख़ुशी। 

Thursday, May 14, 2015

रात आती है


रात  आती है ,फूलों और कलियों के लिए ,
एक नई सौगात लेकर ,
रात आती है,किसी दुल्हन के लिए ,
दूल्हे की बरात लेकर ,
रात आती है किसी कवि के लिए ,
एक नई जज्बात लेकर ,
रात आती है किसानों के लिए ,
एक नई सुप्रभात लेकर ,

रात आती है ,चाँद और सूरज के लिए ,
एक नया संसार लेकर ,
रात आती लता और बेलों के लिए ,
नवजीवन के आसार लेकर ,
रात आती है किसी ज्ञानी के लिए ,
ज्ञान का अक्षय भण्डार लेकर ,
रात आती है किसी ध्यानी के लिए , 
निर्गुण के आकार लेकर ,

रात आती है किसी फकीर के लिए ,
एक दुखद अहसास लेकर ,
रात आती है किसी अमीर के लिए ,
एक सुखद अहसास लेकर ,
रात आती है जवानों के लिए।,
जिम्मेदारी का अहसास लेकर,

रात आती किसी  योगी के लिए ,
 जीवन में प्रकाश लेकर ,
रात आती है किसी रोगी के लिए ,
दर्द का अहसास लेकर ,
रात आती है किसी भोगी के लिए ,
शराब और शबाब लेकर ,

रात आती है किसी बचपन के लिए ,
एक चुलबुलाता अहसास लेकर ,
रात आती है ,बुढ़ापे के लिए ,
अतीत के अहसास लेकर ,
रात आती है हारे हुए मन के लिए ,
एक नई  आस लेकर ,
रात आती है किसी आस के लिए ,
एक नया विश्वास लेकर । 

Monday, May 4, 2015

कभी-कभी


होंठों से निकले ये चंद शब्द ,
कितना सुख देते हैं कभी -कभी ,
तीरों की तरह के ये ही शब्द ,
सब कुछ ले लेते हैं कभी - कभी ,

चंद लफ्जों पर ही कितने लोग ,
जान दे देते हैं कभी -कभी ,
इन्ही चंद लफ्जों से लोग,
जान ले भी लेते हैं  कभी -कभी ,
ये लफ्ज जब दिल खून से ,
लिखे जाते हैं पन्नों पर ,
कितने ही लोगों के ,
जीवन बदल देते हैं  कभी -कभी ,

इन्हीं चंद लफ्जों से लोग ,
फिसल भी जाते हैं  कभी -कभी ,
इन्हीं चंद लफ्जों से लोग ,
मचल भी जाते हैं  कभी -कभी ,
पर वे लोग कितने बदकिस्मत होते  हैं जो ,
 अपने ही लफ्जों से , मुकर जाते हैं कभी -कभी। 

Sunday, May 3, 2015

एक पल


न जाने ये एक पल ,
कल किसके  किस्मत का तारा बने ,
न जाने इसी एक पल में ,
कौन किसका सहारा बने ,
लेने को तो ले लेते हैं लोग ,
जान  भी एक पल में ,
मेरे दोस्त , इसी एक पल पर ,
थोड़ा सा प्यार बरसा दो ,
पर इस तरह की कोई एक नहीं ,
बल्कि सारा जग तुम्हारा बने। 

लोग तो कहते हैं, प्यार से बुलाने पर,
ईश्वर भी आते हैं , धरती पर,
किसने , कब और कहाँ देखा है , ईश्वर को ,
प्यार का नाम ही ईश्वर है। 
इतना प्यार बरसा दो इस पल पर 
की लोग तुम्हे ही देवता कहें ,
और हर दीन दुखियों का सहारा ,
तुम्हारे प्यार की धारा बने ,
 और हर दीन दुखियों का सहारा ,
तुम्हारे प्यार की धारा बनें। 

Saturday, May 2, 2015

ओ शहंशाहों

मत घसीटो आबरू को तुम,
यूँ राहों में ओ शहंशाहों !
डूब जाओगे तुम उनकी ,
आहों में ओ शहंशाहों !
छोड़ के बैठे हो तुम , 
घर के चिरागों को , 
जिसकी पनाहों में ओ शहंशाहों ,
हो न जाए कही अँधेरा , 
उस घर की राहों में ओ शहंशाहों ! 
जा न पाएंगे ये बच्चे ,
घर से निकलकर , फिर घर की तरफ ,
उनकी राहों में यूँ काँटे ,
तुम न बिछाओ ओ शहंशाहों ! 
कितने प्रयोग करोगे तुम इन , 
नन्हीं-नन्हीं  जानों पर ?
अपनी जान बचाने को , 
न लो इनकी जानें ओ शहंशाहों ! 
नजरें डालो ज़रा , 
अपनी गिरहबान पर ,
 गुनाहों का पिटारा ,
नजर आएगा तुम्हें अपने अंदर ,
औरों की गिरहबान पर कीचड़ , 
इस तरह न उछालो ओ शहंशाहों ! 
इस देश को बचाने अब , 
नहीं आएंगे बापू फिर , 
हो सके तो इस देश को अब , 
बचालो ओ शहंशाहों !